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मजूरी , दाम और मुनाफा

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मजूरी , दाम और मुनाफा

Book Details

  • Author: काल मार्क्स

  • Edition: जनवरी 2014

  • Cover: Paperback

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक काल मार्क्स के राजनीतिक–आर्थिक विचारों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ के साथ प्रस्तुत करती है। इसमें यूरोप में फैल रही हड़तालों की लहर, मज़दूरी बढ़ाने की माँग और श्रमिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि को केंद्र में रखा गया है। लेखक नागरिकों को संबोधित करते हुए विषय पर आने से पहले कुछ प्रारंभिक, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करते हैं, जो उस समय की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को समझने के लिए आवश्यक हैं।

मार्क्स यह रेखांकित करते हैं कि यूरोप में हड़तालें किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक प्रकार की “महामारी” के रूप में फैल चुकी हैं। मज़दूरी वृद्धि की माँगें केवल आर्थिक प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे वर्ग संघर्ष, संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रमिक एकता से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसी कारण यह मुद्दा कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय संघ के नेताओं के सामने भी अनिवार्य रूप से आता है।

पुस्तक इस बात पर ज़ोर देती है कि ऐसे निर्णायक प्रश्नों पर अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघ के नेताओं और प्रतिनिधियों का स्पष्ट, पक्का और सुसंगत दृष्टिकोण होना चाहिए। यह कृति श्रम आंदोलन, राजनीतिक अर्थशास्त्र और मार्क्सवादी विचारधारा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मज़दूरी, हड़ताल और वर्ग संघर्ष जैसे विषयों को वैचारिक गहराई और ऐतिहासिक दृष्टि के साथ समझने में सहायता करती है।

$0.08

Original: $0.27

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  • Author: काल मार्क्स

  • Edition: जनवरी 2014

  • Cover: Paperback

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक काल मार्क्स के राजनीतिक–आर्थिक विचारों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ के साथ प्रस्तुत करती है। इसमें यूरोप में फैल रही हड़तालों की लहर, मज़दूरी बढ़ाने की माँग और श्रमिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि को केंद्र में रखा गया है। लेखक नागरिकों को संबोधित करते हुए विषय पर आने से पहले कुछ प्रारंभिक, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करते हैं, जो उस समय की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को समझने के लिए आवश्यक हैं।

मार्क्स यह रेखांकित करते हैं कि यूरोप में हड़तालें किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक प्रकार की “महामारी” के रूप में फैल चुकी हैं। मज़दूरी वृद्धि की माँगें केवल आर्थिक प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे वर्ग संघर्ष, संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रमिक एकता से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसी कारण यह मुद्दा कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय संघ के नेताओं के सामने भी अनिवार्य रूप से आता है।

पुस्तक इस बात पर ज़ोर देती है कि ऐसे निर्णायक प्रश्नों पर अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघ के नेताओं और प्रतिनिधियों का स्पष्ट, पक्का और सुसंगत दृष्टिकोण होना चाहिए। यह कृति श्रम आंदोलन, राजनीतिक अर्थशास्त्र और मार्क्सवादी विचारधारा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मज़दूरी, हड़ताल और वर्ग संघर्ष जैसे विषयों को वैचारिक गहराई और ऐतिहासिक दृष्टि के साथ समझने में सहायता करती है।