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संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र- Structuralism Post-structuralism and Oriental Poetry (Awarded Critique Book by Sahitya Akademi)

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संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र- Structuralism Post-structuralism and Oriental Poetry (Awarded Critique Book by Sahitya Akademi)

Book Details
Publisher: Sahitya Akademi
Author: Gopi Chand Narang
Language: Hindi
Edition: 2002
Pages: 456
Cover: Hardcover
ISBN: 9788126007981
Dimensions: 23 cm × 15 cm
Weight: 670 gm

About the Book
यह पुस्तक हिंदी साहित्य और आलोचना के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कृति मानी जाती है। गोपी चंद नारंग ने इसमें साहित्यिक सिद्धांतों, आलोचनात्मक दृष्टिकोणों और वैचारिक प्रवृत्तियों का गहन, सुव्यवस्थित और विद्वतापूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेखक की अंतरराष्ट्रीय ख्याति और व्यापक अकादमिक अनुभव इस कृति की प्रत्येक पंक्ति में परिलक्षित होता है।

पुस्तक में विषय को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, साहित्यिक आंदोलनों और आधुनिक आलोचनात्मक विमर्श के संदर्भ में विस्तार से समझाया गया है। लेखक ने परंपरा और आधुनिकता के बीच के संबंधों को स्पष्ट करते हुए पाठक को साहित्य के बदलते स्वरूप और उसकी व्याख्या की नई दिशाओं से परिचित कराया है। भाषा गंभीर होते हुए भी स्पष्ट और प्रभावशाली है, जिससे जटिल सैद्धांतिक अवधारणाएँ भी सहज रूप से समझ में आती हैं।

साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, अध्यापकों और आलोचना में रुचि रखने वाले गंभीर पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। यह पुस्तक न केवल अध्ययन और शोध के लिए एक विश्वसनीय संदर्भ ग्रंथ है, बल्कि हिंदी साहित्यिक चिंतन को गहराई से समझने के लिए एक संग्रहणीय कृति भी है।



$0.96

Original: $3.20

-70%
संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र- Structuralism Post-structuralism and Oriental Poetry (Awarded Critique Book by Sahitya Akademi)

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Description

Book Details
Publisher: Sahitya Akademi
Author: Gopi Chand Narang
Language: Hindi
Edition: 2002
Pages: 456
Cover: Hardcover
ISBN: 9788126007981
Dimensions: 23 cm × 15 cm
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About the Book
यह पुस्तक हिंदी साहित्य और आलोचना के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कृति मानी जाती है। गोपी चंद नारंग ने इसमें साहित्यिक सिद्धांतों, आलोचनात्मक दृष्टिकोणों और वैचारिक प्रवृत्तियों का गहन, सुव्यवस्थित और विद्वतापूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेखक की अंतरराष्ट्रीय ख्याति और व्यापक अकादमिक अनुभव इस कृति की प्रत्येक पंक्ति में परिलक्षित होता है।

पुस्तक में विषय को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, साहित्यिक आंदोलनों और आधुनिक आलोचनात्मक विमर्श के संदर्भ में विस्तार से समझाया गया है। लेखक ने परंपरा और आधुनिकता के बीच के संबंधों को स्पष्ट करते हुए पाठक को साहित्य के बदलते स्वरूप और उसकी व्याख्या की नई दिशाओं से परिचित कराया है। भाषा गंभीर होते हुए भी स्पष्ट और प्रभावशाली है, जिससे जटिल सैद्धांतिक अवधारणाएँ भी सहज रूप से समझ में आती हैं।

साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, अध्यापकों और आलोचना में रुचि रखने वाले गंभीर पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। यह पुस्तक न केवल अध्ययन और शोध के लिए एक विश्वसनीय संदर्भ ग्रंथ है, बल्कि हिंदी साहित्यिक चिंतन को गहराई से समझने के लिए एक संग्रहणीय कृति भी है।